बुधवार, 29 जुलाई 2009

जयपुर की पूर्व राजमाता का निधन


शाही शानोशौकत का जीवंत प्रतीक रही जयपुर की पूर्व राजमाता गायत्री देवी आज हम सबको छोड़कर हमेशा के लिए चली गई। अपनी युवावस्था में दुनिया की दस खूबसूरत महिलाओं में निनी जाने वाली गायत्री देवी का लंबी बीमारी के बाद 90 साल की उम्र में देहांत हो गया। कूच बिहार के पूर्व राजवंश की राजकुमारी गायत्री देवी ने जयपुर की रियासत के आखिरी राजा सवाई मानसिंह द्वितीय से विवाह किया और वो तत्कालीन महाराजा की तीसरी महारानी के रू प में जयपुर आई। गायत्री देवी के निधन पर सूबे के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सहित कई हस्तियों ने शोक जताया है।

लंदन में जन्मी गायत्री देवी की प्रारंभिक शिक्षा शान्ति निकेतन में हुई। बाद में उन्होंने स्विट्जरलैंड के लाजेन में अध्ययन किया। उनका राजघराना अन्य राजघरानों से कहीं अधिक समृद्धशाली था। गायत्री देवी ने 15 अक्तूबर 1949 को पुत्र जगत सिंह को जन्म दिया। महारानी गायत्री देवी को बाद में राजमाता की उपाधि दी गई। जगत सिंह का कुछ साल पहले ही निधन हो गया था। जगत सिंह जयपुर के पूर्व महाराजा भवानी सिंह के सौतेले भाई थे। गायत्री देवी की शुरू से ही लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने में रुचि रही यही कारण रहा कि गायत्री देवी ने गायत्री देवी गल्र्स पब्लिक स्कूल की शुरूआत की। इस स्कूल की गणना जयपुर के सर्वोत्तम स्कूलों में आज भी है। पूर्व राजमाता ने जयपुर की 'ब्लू पोटरी ’ कला को भी जमकर बढ़ावा दिया।

गायत्री देवी 1939 से 1970 के बीच जयपुर की तीसरी महारानी थीं। वह अपने अप्रतिम सौन्दर्य के लिए जानी जाती थीं। वह एक सफल राजनीतिज्ञ भी रहीं। वह अपने समय की फैशन आइकन मानी जाती थीं। राजघरानों के भारतीय गणरा’य में विलय के बाद गायत्री देवी राजनीति में आईं और जयपुर से 1962 में मतों के भारी अंतर से लोकसभा चुनाव जीता। गायत्री देवी का जन्म 23 मई 1919 को लंदन में हुआ था। पूर्व महारानी ने सुंदरता की दौड़ में अव्वल रहने के साथ साथ राजनीति क्षेत्र में भी अपना परचम लहराया और वर्ष 1967 और 1961 में भी उन्होंने जयपुर से लोकसभा सीट पर भारी मतों से जीत अर्जित की।

शनिवार, 25 जुलाई 2009

बचपन से खिलवाड़ क्यों?

हम बच्चों से उनका बचपन क्यों छीन रहे हैं? फिल्म व टीवी संस्कृति हमारे बच्चों को समय से पहले ही वयस्क बना रही है। आए दिन चैनलों पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों में बच्चों से हास्य के नाम पर फूहड़ बातें सुनने को मिलती हैं। आठ-नौ साल का बच्चा माता-पिता के संबंधों पर व्यंग्य प्रस्तुत करता है और पेरेंट्स दर्शक दीर्घा में बैठकर प्रसन्न होते रहते हैं। क्या वह बच्चा इन सब बातों को समझता है? यहीं नहीं, डांस कार्यक्रमों में भी बच्चे अश्लील पोशाकें पहनकर अश्लील डांस करते हैं और जज से लेकर दर्शक तक उनकी तारीफ करते हैं। माना, बच्चों में प्रतिभा है, पर उसका इस तरह से उपयोग समझ नहीं आता। क्या यह सब कुछ सही हो रहा है मेरी राय से तो इसका बच्चों पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है।
अभी कुछ दिन पहले ही एक चैनल पर किसी कार्यक्रम में अपना टैलेंट दिखाने के लिए आठ साल की बच्ची फिल्मी आइटम डांसरों जैसा डांस कर रही थी। एक सात साल का बच्चा तांत्रिक द्वारा किए जाने वाले वीभत्स कृत्यों को अपने डांस द्वारा दर्शा रहा था। मुझे तसल्ली हुई कि इस कार्यक्रम के जजों ने अपनी जिम्मेदारी को अच्छे से निभाया और बच्चों की प्रतिभा को बिना नकारे हुए, उनके द्वारा किए जाने वाले अश्लील व वीभत्स कृत्यों के लिए उनके माता-पिता को उनकी जिम्मेदारी का अहसास करवाया।
मुझे तो उन पेरेंट्स पर दया आई, जो थोड़ी-सी प्रसिद्धि पाने के लिए अपने अबोध बच्चों से कुछ भी करवाने के लिए तैयार थे। आज बच्चों पर वैसे भी पढ़ाई और प्रतियोगिता का इतना प्रेशर है कि उनकी कुंठाओं की झलकियां बोर्ड रिजल्ट्स आते ही आत्महत्या की खबरों के रूप में अखबार में पढऩे को मिल जाती हं। बच्चों के बचपन को अपनी आकांक्षाओं के बोझ तले दबाने से बेहतर है कि उन्हें उनका बचपन अभिभावक पूरी स्वतंत्रता से जीने दें।

रविवार, 12 अप्रैल 2009

सियासत में सब जायज!

कहा जाता है प्रेम और जंग में सब कुछ जायज है। लेकिन अब राजनीति भी इसमें शामिल हो गई है। यहीं कारण है कि वोट की राजनीति के लिए नेता आज हर तरह के हथकंडे अपना रहे है। कुछ भी बको बस अखबार के पहले पन्ने पर और चैनल के प्रमुख समाचारों में तवज्जो मिल जाए। इन नेताओं की जीभ इतनी कड़वी हो गई है कि आजकल इनके मुंह से शब्दों की जगह जहर निकलने लगा है। हो सकता है ये नेता ऐसा उल-जुलूल बयान किसी विशेष संप्रदाय के वोट पाने की खातिर अपना रहे हो, लेकिन यह हमारे लोकतंत्र के लिए बहुत की घातक है और आने वाले समय में इसके गंभीर परिणाम सामने आएंगे। एक तरफ जहां वरुण गांधी ने सांप्रदायिक भाषण दिया, तो दूसरी ओर राबड़ी देवी ने एक मुख्यमंत्री के लिए इतने भद्दे शब्दों का प्रयोग किया। क्या एक पूर्व मुख्यमंत्री के लिए किसी सीएम के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग उचित है? खैर मैं तो इससे सहमत नहीं हूं। हमारे देश में ऐसे बयाने देने वाले नेताओं की एक फौज सी खड़ी हो गई है। जिस तरह लालू प्रसाद यादव ने वरुण गांधी को रोलर के नीचे कुचलने का कथित भाषण दिया उससे आप सोच सकते है कि हमारे देश के नेताओं की कैसी सोच है। सब कुछ सिर्फ वोट के लिए कुछ भी बको छूट जो मिली है! बात यहां तक आ गई है कि नेता एक दूसरे के निजी जीवन पर भी टिप्पणी करने से नहीं चूक रहे है। अगर हमारे देश में ऐसा ही चलता रहा तो एक दिन इसके बहुत बुरे परिणाम सामने आएंगे।

शनिवार, 7 मार्च 2009

हैप्पी होली


आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएं। होली करीब आते ही मन में रंगों की होली शुरू हो जाती है। मन करता है सबकों होली के रंग में रंग डालें। होली ही एक ऐसा त्यौहार होता है जिस दिन दोस्त और दुश्मन सभी पर रंग डाला जाता है। होली के करीब आते ही बच्चों में एक अलग सा उत्साह नजर आता है। स्कूल में ही छात्र कलम की स्याही अपने-अपने दोस्तों के कपड़ों पर डालने लग जाते हैं कुछ बच्चे रंग डालते है। मैं या आप ने भी शायद बचपन में ऐसा किया हेागा। सच में बचपन में होली खेलने में बहुत मजा आता था। होली ख्ेालने के लिए ना नुकूर करता, लेकिन फिर मन करता कोई आ जाए और रंग डाल दे। बहुत लोग ऐसे हैं जो झूठमूट होली खेलने के लिए मना करते हैं लेकिन उनका मन होली खेलने के लिए लालायित रहता है। और जैसी उन्हें कोई थोड़ा सा रंग लगा देता है वे होली के रंग में सराबोर हो जाते हैं। होली को बिछड़े यारों से मिलने का मौका भी मिलता है। क्यों कि सभी होली के दिन अपने-अपने घर आते हैं। बहुत अच्छा लगता है सभी से मिलकर। लेकिन बात जब रंगों की हो तो इस बात का ध्यान रखना भी जरूरी हो जाता है कि रंग खुशियों के हों। इसलिए होली खेलते समय सावधानी जरूर बरतें। रंग और गुलालों में प्रयोग किए जाने वाले केमिकल्स आपकी त्वचा पर बुरा असर डालते हैं। असर इतना गहरा होता है कि वे पूरी जिंदगी के लिए नासूर हो जाते है। यदि ये केमिकल युक्त रंग गलती से आंखों में चले जाए तो आंखों की रोशनी भी जा सकती है। इसलिए सही रहेगा की आप रंगो की बजाय हल्के गुलाल से होली खेले। रंग से मुंह रगडऩे की बजाय प्रेम से चुटकी भर गुलाल गाल पर लगाएं। तो एक बार फिर हैप्पी होली..........

मंगलवार, 3 मार्च 2009

कब सुधरेगा पाकिस्तान?


भारतीय उप महाद्वीप की जनता का जुनून कहा जाने वाला क्रिकेट आतंककारी हमले का निशाना बन गया। म्यूनिख ओलम्पिक (१९७२) के बाद दुनिया के इतिहास में दूसरी बार आतंककारियों ने खिलाडिय़ों को निशाना बनाया। लाहौर मेंदूसरे टेस्ट मैच के तीसरे दिन का खेल शुरू करने के लिए गद्दाफी स्टेडियम जा रहे श्रीलंकाई क्रिकेट टीम की बस पर करीब १२ अज्ञात नकाबपोश बंदूकधारियों ने ए.के. राइफलों, हैण्डग्र्रेनेड और राकेट लांचरों से हमला किया। हमले में छह खिलाड़ी और सहायक कोच, एक रिजर्व अम्पायर घायल हो गए। आतंककारियों की गोलियों से छह सुरक्षा कर्मी व एक बस चालक मारे गए। श्रीलंकाई क्रिकेटरों पर हमले से खेल जगत स्तब्ध रह गया।
उधर, हमलावरों को पकडऩे में विफल रहे पाक सुरक्षा तंत्र ने ४ संदिग्धों को हिरासत में लिया है। लेकिन किसी भी आतंकी को पकडऩे में पाक नाकाम रहा। श्रीलंकाई क्रिकेटरों को ले जाती बस को अचानक निशाना बनाकर हिंसा और दहशत के सौदागरों ने साफ कर दिया है कि वे संबंधों और संस्कृतियों को बढ़ावा देनेवाली किसी भी पहल के दुश्मन हैं। लाहौर हमले से पाकिस्तान क्रिकेट को जो विराट क्षति पहुंचने वाली है, वह समूचे भारतीय उपमहाद्वीप के लिए चिंताजनक होनी चाहिए। अगर इस उपमहाद्वीप में क्रिकेट लडख़ड़ा गया, तो ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका जैसी कथित क्रिकेट महाशक्तियां भी उसे नवजीवन नहीं दे पाएंगी।
पर विडंबना देखिए कि ऐसी किसी साजिश को निर्मूल करने की प्रतिबद्धता जताने के बजाय पाकिस्तान भारत पर आरोप लगा रहा है। पाक के इस तरह के गैर जिम्मेदार रवैये से एक प्रश्न उठता है कि आखिर पाकिस्तान कब सुधरेगाï? पाकिस्तान ने मुंबई हमले में भी इसी तरह का रवैया अपनाया और अनाप-सनाप बेहुदे बयान देता रहा। शायद पाकिस्तान में बयान देना तो मामूली बात हो गई है कुछ भी बक दो। यदि पाकिस्तान समय रहते नहीं सुधरा तो एक दिन वह ऐसे रास्ते पर खड़ा होगा जहां एक तरफ कुआ और एक तरफ खाई होगी।

शनिवार, 28 फ़रवरी 2009

तनाव भगाओ, ज्यादा नंबर पाओ


हर राज्य में बोर्ड परीक्षाएं शुरू होने वाली हैं। जैसे-जैसे परीक्षा के दिन करीब आएंगे, वैसे-वैसे स्टूडेंट्स के साथ ही उनके अभिभावकों के तनाव व व्याकुलता में बढ़ोतरी देखने को मिलेगी। लेकिन ध्यान देने की बात है कि कई छात्र ऐसे भी होते हैं, जो परीक्षा के फोबिया से प्रभावित हुए बिना मजबूत मनोबल और धैर्य के साथ तैयारी में जुटे रहते हैं। ऐसा आपके साथ भी हो सकता है, यदि आप व्यवस्थित रणनीति के साथ तैयारी को अंजाम दें। पहली बात है कि बोर्ड परीक्षा को भी सामान्य परीक्षाओं की तरह ही लें। तैयारी के लिए अभी भी आपके पास काफी समय है। कम समय और कम मेहनत के बावजूद यदि आप अपनी पढ़ाई और परीक्षा हाल की बेहतर रणनीति बना सकें, तो बेहतर रिजल्ट हासिल करना कोई कठिन काम नहीं है। जानिए ऐसे ही टिप्स, जो आपको दिला सकते हैं जीत

बनाएं सही रणनीति
अंतिम एक माह की रणनीति बनाने से पहले जरूरी है कि आप अपनी क्षमताओं का सही आकलन करें। यदि आप अभी तक अच्छा प्रदर्शन करते आ रहे हैं, तो परीक्षा से पहले एक-दो सप्ताह का समय उन विषयों को समझने में दें, जिन पर आपकी पकड़ कमजोर है या जिन्हें याद करने में परेशानी होती है। पढ़ाई मेें कमजोर छात्रों के लिए यह समय किसी भी दृष्टि से नए-नए तरीके आजमाने का नहीं है। जिन विषयों पर आपकी पकड़ मजबूत हैं, उन्हें इस तरह तैयार कर लें कि उसमें से पूछे गए सभी प्रकार केप्रश्नों को हल करने में आप सक्षम हों। इसके अतिरिक्त यदि आप बारहवीं की परीक्षा के बाद होने वाली किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी भी कर रहे हैं, तो फिलहाल उसको २० से ३० प्रतिशत समय दें, बाकी समय बोर्ड परीक्षाओं की तैयारियों को देना ठीक रहेगा।

पढ़ाई में संतुलन बहुत जरूरी
पढ़ाई में संतुलन बहुत जरूरी है। इसके लिए रिकग्नाइज, रिवाइज, रेस्ट, रिलैक्स और रिएश्योर का ५ आर फार्मूला बहुत उपयोगी है। कैरियर काउंसलर परवीन मल्होत्रा के अनुसार यह समय खुद को व्यवस्थित करने का है। तैयारी को अंतिम रूप देने के लिए आप अपने सभी पाठ्यसामग्री और नोट्स को एक जगह एकत्रित कर लें। यदि आप इसे सही तरीकेसे कर लेते हैं, तो आपका डर ३० से ४० प्रतिशत कम हो जाएगा।

पढ़ाई के साथ-साथ मनोरंजन
लगातार पढ़ाई के साथ-साथ मनोरंजन भी जरूरी है। ऐसे में अपनी क्षमता केमुताबिक पढ़ाई के बीच थोड़ा-थोड़ा बे्रक भी लेना अच्छा रहता है। इलाहाबाद स्थित ज्वाला देवी विद्या मंदिर के प्रधानाचार्य चिंतामणि सिंह बताते हैं 'ब्रेक का उद््देश्य दिमाग को आराम देना है। इससे आगे की पढ़ाई के लिए आप खुद को तैयार कर सकते हैं। अमूमन छात्र ब्रेक का सही इस्तेमाल नहीं करते। दोस्तों से फोन पर लंबी बातचीत, देर तक फिल्में देखने या कंप्यूटर पर वीडियो गेम खेलने में ही खुद को थका देते हैं। यदि आप गणित और विज्ञान केस्टूडेंट हैं, तो ब्रेक के समय का उपयोग आप नोट्स और फार्मूलों के रिवीजन में कर सकते हैं। पुस्तकों के अलावा अखबार आदि में दिए गए क्रॉस वर्ड या प्रॉब्लम्स को हल करने से भी दिमाग सक्रिय बनता है। इससे आप कम समय में संभावित हल सोचने की क्षमता विकसित कर लेते हैं। लेकिन बे्रक की समय-सीमा का भी ध्यान रखना जरूरी है।

अभ्यास पर दें बल
पढ़ाई का कोई लाभ तब तक नहीं है, जब तक कि आप मॉडल सेंपल टेस्ट पेपर का अभ्यास न करें। थ्योरम्स या कंसेप्ट्स को लंबे समय तक स्मृति में बनाए रखने केलिए जरूरी है कि आप उनके एप्लीकेशन संबंधी प्रश्नों को हल करें। काउंसलर जतिन चावला कहते हैं कि अमूमन छात्रों में थ्योरम, फार्मूलों व परिभाषा को बिना समझे याद करने की प्रवृत्ति देखी जाती है। यह आसान तरीका अवश्य है, पर अंतिम समय में भूलने की गुंजाइश बढ़ जाती है। कई बार देखने को मिलता है कि स्टूडेंट किसी कोचिंग सेंटर के नोट्स लेकर उन्हें रटना शुरू कर देते हैं। बेहतर होगा आप पहले विषय को अच्छी तरह समझ लें। खासतौर पर एप्लायड प्रश्नों को हल करने केलिए यह बेहद जरूरी है।

लैंग्वेज और आर्ट पेपर
आट्र्स के विषयों की तैयारी का बेहतर तरीका है कि विषय को कहानी की तरह समझ लिया जाए। यदि पूरा उत्तर लिखने का समय नहीं है, तो रिवीजन के दौरान प्रश्नों के महत्वपूर्ण बिंदुओं को अवश्य लिखकर देखें। थ्योरी वाले प्रश्नों के उत्तर लिखने से पहले प्रश्न को अच्छी तरह पढ़ लें, उसके अनुरूप ही टू द पॉइंट उत्तर दें। अमूमन स्टूडेंट्स कम अंकों के प्रश्नों के लंबे उत्तर लिखने में समय व्यर्थ कर देते हैं, जिसस आखिरी में उन्हें पर्याप्त समय नहीं मिल पाता। पढ़ाई के लिए टाइम टेबल बनाना अच्छा है, पर इसमें परिवर्तन की गुंजाइश भी रखें। मान लीजिए आपने डेढ़ घंटे का समय किसी विषय के रिवीजन को दिया है और वह उतने समय में पूरा नहीं हो पा रहा है, तो आप घबराएं नहीं। जिस विषय को शुरू किया है उसे पूरा अवश्य कर लें।

(क्या करें क्या न करें)
क्या करें
जितना अभ्यास करेंगे, उतनी आसानी से सवाल हल कर पाएंगे। रिवाइज करने के दौरान महत्वपूर्ण बिंदुओं को लिख लें।
पाठ याद करने के लिए केवल रटिए नहीं, बल्कि विषय को समझिए भी।
समय सारिणी बनाएं। जिस विषय में आप कमजोर हैं, उसकी तैयारी में ज्यादा समय दें।
अगर किसी विषय की पढ़ाई में बोरियत होती है, तो तुरंत उसे छोड़कर दूसरा विषय पढ़ें।
पढ़ाई के लिए वही समय चुनें, जिस समय आपको परीक्षा देनी है। इससे आपके शरीर का बायोक्लॉक सेट हो जाएगा।
इस दौरान सुपाच्य भोजन और कम से कम छह घंटे की नींद जरूरी है। तभी आपका शरीर ठीक रहेगा।
अतीत को भूल जाएं। यह समझें कि आप जैसे हैं, उससे बेहतर कर सकते हैं। अच्छे की उम्मीद करें।
हमेशा खुश रहने की कोशिश करें। याद रखें, परीक्षा के लिए अपने को जितना बोझरहित करेंगे, आपके लिए उतना ही अच्छा होगा।
परीक्षा हॉल में शांत और तनावरहित होकर जाएं। ऐसे समय आत्मविश्वास ही आपकी मदद करता है।
आसान सवालों को पहले हल करने की कोशिश करें।
यह जान लें कि खूब पढऩे वाला नहीं, सवालों को सही तरीके से हल करने वाला ही बेहतर प्रदर्शन करता है।

क्या न करें
इन दिनों कठिन व्यायाम से दूर ही रहें। इस समय मामूली चोट भी घातक हो सकती है।
किसी नई किताब या स्टडी मैटीरियल से रिवीजन न करें। इससे आपकी तैयारियों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
अगर साथियों के साथ ग्रुप में तैयारी कर रहे हैं, तो लंबे डिस्कशन से यथासंभव बचने की कोशिश करें।
दूसरों के विचारों से खुद को कतई न आंकें। नकारात्मक भावनाएं या आशंकाएं मन में बिलकुल न आने दें।
तनाव बिलकुल न लें। ध्यान रखें, इस समय किसी भी तरह का मानसिक तनाव शारीरिक चोट की तुलना में अधिक घातक हो सकता है।
परीक्षा से पहले मनोरंजन एकदम बंद न करें। इससे आप चिड़चिड़े हो सकते हैं।
पढ़ाई से ब्रेक लेने के दौरान पढ़ाई के बारे में बिलकुल भी न सोचें। इससे आपका मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ सकता है।
परीक्षा हॉल में जाने के बाद किसी से अनावश्यक बातचीत न करें। ऐसा कुछ न करें, जिससे आपकी एकाग्रता भंग होती है।
कठिन सवालों को पहले हल करने की भूल बिलकुल न करें। इससे आपका समय बरबाद हो सकता है और कुछ सवाल छूट सकते हैं।
परीक्षा हॉल से जल्दी कतई न निकलें। सवाल हल करने के बाद कुछ समय बचता है, तो अपनी पूरी कॉपी जांचें।

रविवार, 22 फ़रवरी 2009

पीछे की सवारी पर भी हेलमेट की तैयारी


सड़क दुर्घटना में एक आदमी की भी जान जाना उतना दुर्भाग्यपूर्ण है, जितना कि पुलिस की गोली से मरना। सूबे के मुख्यमंत्री की यह बात बिलकुल सही है। हर रोज गैर जिम्मेदार ड्राइव से बहुत लोग भगवान को प्यारे हो जाते है और घरवालों को रोने के लिए छोड़ जाते हैं। लेकिन यदि हम थोड़ी सी सावधानी बरतें तो इससे बचा जा सकता है। ऐसे में सीएम साहब का कहना कि प्रदेश में दुपहिया वाहनों पर पीछे बैठने वालों के लिए भी हेलमेट अनिवार्य होना चाहिए काबिले तारीफ और सुरक्षा के लिए बहुत ही अच्छा कदम है। आज के युवा हेलमेट का प्रयोग सुरक्षा के लिए करने के बजाय चालान से बचने के लिए करते है। हो सकता है कभी-कभार मैंने या आपने भी ऐसी गलती की हो। लेकिन यह बहुत की गलत बात है। बस एक छोटा सा बोझ हमसे हमारी जिंदगी छिन लेता है। तो क्या हमें हेलमेट सिर्फ चालान से बचने के लिए करना चाहिए? नहीं। हेलमेट का प्रयोग हमें हर समय करना चाहिए चाहे हम पास के बाजार में ही क्यों न जा रहे हो। इस मामले में लड़कियों का तो बहुत ही ज्यादा गैर जिम्मेदाराना रवैया है। सुंदर दिखने की चाहत में वो तो इसे शायद बोझ समझती हैं और इसका प्रयोग कम ही करती है। पुलिस वाला भी तो उनसे कुछ नहीं कहता। बस लड़की एक बार मुस्कुरा क्या गई खुश। कोई चालान नहीं जाओ। भई ऐसा क्यों? इस मामले में पुलिस और हम सभी को एक बड़ी जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी तभी जाकर ऐसी दुर्घटनाओं पर लगाम लग सकेगी। तो आप सभी से गुजारिश है कि आप जब भी बाहर निकलें हेलमेट लगाने के साथ ही यातायात के नियमों का पालन करें।